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Friday, March 26, 2010

धनतेरस के दिन

I was inspired to write this poem by my friend Shruti . She saw the whole incidence on dhanteras and toled me about it. As the plot is not original, I have written this through her pen. This is my first narrative poetry with random rhyming scheme.



धनतेरस के दिन
जब बरस रही थी लक्ष्मी पूरे बाज़ार में,
जब ख़ुशी थी आई पैसे रूपी आकार में,
रोशनी में नहाने को हर कोना तैयार था,
मैं भी पहुंची ऐसे आडम्बर के संसार में||


हर कोई दिखावे में चूर था,
कोई बनारसी साड़ी, तो कोई लहंगा खरीदने को मजबूर था,
एक बच्चा भोला, मासूम, परेशान,
इन सब से कहीं बहुत दूर था||


रोता हुआ बच्चा अपनी माँ का ध्यान न खींच पाया,
पर तभी एक गुब्बारे वाला उसकी नज़र में आया,
गुब्बारे के रंग के आगे सभी रंग फीके थे,
गुब्बारे वाले को भी उम्मीद का भंवरा नज़र आया||


सुबह से चार गुब्बारे बिके थे,
फिर भी लगा हुआ था खोमचा लेकर,
सोच के ये कि वो भी दिवाली मनायेगा,
बच्चों के लिए पटाके और घर में मिठाई लाएगा||


किलकारी लिए वो बच्चा,
पहुंचा गुब्बारे वाले के पास,
उसने भी बजा के सीटी,
बच्चे का किया स्वागत||


सीटी की आवाज़ सुनके,
और भी बच्चे दौड़े आये,
अब धनतेरस के बाज़ार में,
दिखने वाले थे हर तरफ रंगीन गुब्बारे||


ख़ुशी के इस माहौल को,
एक दुकानदार सह न पाया,
दशहरा बीत चुका था तब भी,
वो दशानन का रूप धर आया||


लगा चिल्लाने गुब्बारे वाले पर,
"सामने से खोमचा हटा !"
गरीब की मजबूरी का,
शायद उसे नहीं था पता||


गुब्बारे वाला बोला,
"बाबूजी बस १० मिनट,
बच्चे घेरे है खड़े,
गुब्बारे बिक जायेंगे सारे! "


सुनते ही यह दुकानदार तिलमिलाया,
कुम्भकरण, इन्द्रजीत साथ ले आया,
पर बचाने उस गुब्बारे वाले को,
कोई राम न आया||


उस दिन टूटी उसकी अयोध्या,
फूटे सारे गुब्बारे ,
पास खड़े लोग भी,
तमाशबीन बने रहे सारे||


अट्ठाहस करता लंकेश , डरा सहमा गुब्बारे वाला !
समेटने लगा बचे हुए तिनके , ढूँढने लगा कहीं और सहारा,
देखा तो बचे हुए थे चंद गुब्बारे,
चला उन्हें लेके वहाँ से||


सन्नाटे को आघात पहुंचा,
जब आवाज़ आई उस बच्चे की,
"गुब्बारा ही तो दे रहा था
इस मारा क्यों?"

Wednesday, October 7, 2009

kyon?? aakhir kyon??

kyon mujhme hai itna khaali pan???
ki jo bhi hokar guzra mujhme reet gaya..

kyon itna andhakaar hai mujhme???
ki mera saara jeevan chamakne ki chah mein beet gaya....

haan !! main ek kathin pathreela rasta hoon..
to fir kyu?? pathik ki aah par main hasta hoon..??

kyu main roshni se itna bachta hoon???
ki sooraj ko bhi paani se rachta hoon..

Saturday, September 5, 2009

talaash

talaash main udaas raasta hoon shaam ka..
teri aahaton ki talaash hai..
ye raaste hai sab bujhe bujhe..
mujhe jugnuon ki talash hai..

main aansu hoon us aankh ka..
jise apno ki talaash hai..
in sunsaan veeraniyon mein mujhe.,..
apni mehfilon ki talash hai.,..

main daraar hoon us mitti ka..
jise nami ki talaash hai...
is sookhe aasmaan mein mujhe...
kaale baadlon ki talaash hai...

main antarman hoon us insaaan ka..
jise "aham" ki talaash hai...
hai brhamaan(universe) krishna mein
aur krishna hai mujhme...
mujhe brahamaan mein "swayam" ki talaaash hai..!!

bhaavna

बिन कहे भी बहुत कुछ कहना चाहती है ये उदासी
इसीलिए हम उसपर हंसी का मुखौटा ओढे रहते है
नहीं बताना चाहते ये दर्द किसी को
क्योंकि लोग उसे समझते कहा है, बस भावनाओं में बहते है

मगर कोई एक तो है जो यह सब समझता है
सब जानता है पर कुछ न कहता है
कौन है ये शख्स जो कभी माता पिता आदि के रिश्तों में दिखता है
तो कभी भाई बहन या भार्या के रूप में सिमटता है

ये और कुछ नहीं हमारा अंतर्मन है
जो उन्हें अलग अलग रूप देता है
भाव सदा एक से नहीं रहते
समय तो सबको बदल देता है

बस इन्ही भावनाओं को अब समझो
याद रखो खाली हाथ तो आये थे
पर खाली हाथ क्या जा पाओगे?
दुनिया से मिले प्यार और नफरत को....
क्या यही छोड़ जाओगे?